
महान कथाकार, उपन्यास सम्राट, शोषितों, वंचितों ख़ास तौर पर किसानों को अपनी रचनाओं में प्रमुखता से स्थान देने वाले मुंशी प्रेमचंद की आज 141वीं जयंती है.
आज ही के दिन 1880 में इस महान कथाकार का बनारस के नजदीक लमही नामक गांव में जन्म हुआ था.
प्रेमचंद का नाम धनपत राय था पहले उन्होंने नवाब राय नाम से लेखन किया और बाद में प्रेमचंद नाम से हिंदी साहित्य लेखन करने लगे.
हिन्दी साहित्य में यथार्थवादी परंपरा की नींव रखने का श्रेय प्रेमचंद को ही दिया जाता है. उन्होंने गांव, गरीब, किसान के दर्द को अपनी लेखनी में मार्मिक तरीके से उकेरा.
बचपन में मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी कहानी ‘ पंच परमेश्वर को पढ़ा था. कहानी में प्रेमचंद ने एक चर्चित पात्र खाला से एक संवाद कहलवाया है. “क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?” ये संवाद खाला ने जुम्मन मियां के खास दोस्त अलगू चौधरी को कही थी.
सेवा सदन, गबन, गोदान, निर्मला, रंगभूमि, प्रेमाश्रम जैसे कालजयी उपन्यास और पंच परमेश्वर, ईदगाह जैसी 300 से ज्यादा कहानियां उनकी महान लेखनी के साहित्यिक धरोहर हैं.
शुरुआत में ‘नवाब राय’ नाम से उर्दू में लेखन किया करते थे लेकिन जब अंग्रेजी हुकूमत ने 1908 में प्रकाशित उनका पहला कहानी-संग्रह ‘सोजे वतन’ जब्त कर लिया तब उन्हें नवाब राय नाम छोड़ना पड़ा और फिर वे प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे.
प्रेमचंद सांप्रदायिकता के घोर विरोधी थे. वो लिखते हैं,
“सांप्रदायिकता को सीधे सामने आने में लाज लगती है, इसलिए वह राष्ट्रवाद का चोला ओढ़कर आती है.”
प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक हैं और सदियों बाद भी भारतीय ग्रामीण जीवन और लोगों के चरित्रों के आकलन के लिए, प्रेमचंद को पढ़ना, अपने समय के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दस्तावेज को पढ़ने जैसा होगा. वो ‘मंगलसूत्र’ नाम का उपन्यास पूरा करने से पहले ही 8 अक्टूबर 1936 को दुनिया छोड़ गए.